Thursday, July 31, 2008

हम बात तुम्हारी क्यों मानें ?




कुछ रंग नहीं, कुछ माल नहीं
कुछ मस्ती वाली बात नही
कुछ खर्च करो, कुछ ऐश करो
कुछ डांस करें, कुछ हो जाए !
जब मौज नहीं कोई धूम नहीं , तब बात तुम्हारी क्यों माने ?

क्या कहते हो ? क्या करते हो
है ध्यान कहाँ ? कुछ पता नहीं
ना टाफी है, ना चाकलेट ,
ना रसगुल्ला, ना बर्गर है
हम मस्त कलंदर धरती के, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?

रंगीन हैं हम, दमदार हैं हम
मस्ती में नम्बरदार, हैं हम
यह समय बताएगा सबको
पढने में तीरंदाज़ हैं हम ,
हम नौनिहाल इस धरती के, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?

हम धूम धाम, तुम टाँय टाँय
हम बम गोले,तुम कांय कांय
हम नयी उमर की नयी फसल
तुम घिसी पिटी भाषण बाजी
हम आसमान के पंछी हैं , हम बात तुम्हारी क्यों माने ?

ना गुलछर्रे, ना हो हल्ला,
हम धूमधाम,तुम सन्नाटा
हम छक्के हैं तेंदुलकर के ,
तुम वही पुराना नजराना
हम रंग जमा दें दुनिया में, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?

हम लड्डू हैं तुम हरा साग ,
हम चाकलेट तुम भिन्डी हो
हम मक्खन हैं,तुम घासलेट
हम रंग रुपहले,तुम कालिख
हम मस्ती मारें इस जग में, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?

24 comments:

  1. हम लड्डू हैं तुम हरा साग ,
    हम चाकलेट तुम भिन्डी हो

    क्या बात है ?
    आज तो आनंद आ गया साहब !
    बहुत बहुत धन्यवाद और शुभकामनाएं !

    ReplyDelete
  2. क्या बात हे अति सुन्दर कविता, लगता हे बाप बेटा अपिस मे बात कर रहे हे, धन्यवाद

    ReplyDelete
  3. हम लड्डू हैं तुम हरा साग ,
    हम चाकलेट तुम भिन्डी हो
    हम मक्खन हैं तुम घासलेट
    हम रंग रुपहले तुम कालिख
    हम मस्ती मारें इस जग में, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?

    वाह मज़ा आ गया.

    ReplyDelete
  4. हम लड्डू हैं तुम हरा साग ,
    हम चाकलेट तुम भिन्डी हो
    हम मक्खन हैं तुम घासलेट
    हम रंग रुपहले तुम कालिख
    हम मस्ती मारें इस जग में, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?

    -भीषण!! बहुत उम्दा.. :)

    ReplyDelete
  5. .


    अरे , तू तो अपनी सोच का निकला यार !
    एकदम ज़ायज़ बात " हम बात तुम्हारी क्यों मानें ? "

    ReplyDelete
  6. हम लड्डू हैं तुम हरा साग ,
    हम चाकलेट तुम भिन्डी हो
    हम मक्खन हैं तुम घासलेट
    हम रंग रुपहले तुम कालिख
    धन्यवाद सतीश जी मजा आ गया दावत का.

    ReplyDelete
  7. ati utaam....maja aa gaya..

    ReplyDelete
  8. bahut maja aaya. Keep it up.
    Ranu

    ReplyDelete
  9. आप को आज़ादी की शुभकामनाएं ...

    ReplyDelete
  10. बाल-मन की जीवन्तता का उतना ही जीवन्त चित्रण।
    बहुत ख़ूब!

    ReplyDelete
  11. बहुत सुंदर, जिंदगी बहुत सुंदर है, उसे जीना है लाईट लेकर.

    ReplyDelete
  12. हम लड्डू हैं तुम हरा साग ,
    हम चाकलेट तुम भिन्डी हो
    हम मक्खन हैं तुम घासलेट
    हम रंग रुपहले तुम कालिख
    हम मस्ती मारें इस जग में, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?
    सतीश जी आपने बचपन याद दिला दिया ...बहुत ही अच्छी रचना है !!!!!!!!!

    ReplyDelete
  13. क्या बात है। बचपन की बेफिक्री याद दिला दी। शुक्रिया।

    ReplyDelete
  14. Create Blogs, Share Opinions, photo sharing, Video Sharing

    Naya Orkut is your place to share videos, audio, photos, and stories. Join now and get your own profile page, blog and unlimited media uploads!

    No invite needed. Find a network of friends & expand your social circle Join Now

    www.nayaorkut.com

    ReplyDelete
  15. रंगीन हैं हम, दमदार हैं हम
    मस्ती में नम्बरदार, हैं हम
    यह समय बताएगा सबको
    पढने में तीरंदाज़ हैं हम ,
    हम नौनिहाल इस धरती के, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?

    bachpan ki yaad dila di aapne. purani yaado k bich le jane k liye shukriya

    ReplyDelete
  16. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  17. इस काव्य की रचना ऐसे सरल शब्दों में की गई है कि यकीन नहीं होता. लिखते रहें!!



    -- शास्त्री जे सी फिलिप

    -- बूंद बूंद से घट भरे. आज आपकी एक छोटी सी टिप्पणी, एक छोटा सा प्रोत्साहन, कल हिन्दीजगत को एक बडा सागर बना सकता है. आईये, आज कम से कम दस चिट्ठों पर टिप्पणी देकर उनको प्रोत्साहित करें!!

    ReplyDelete
  18. अच्छी भिड़न्त है लड्डू, साग, चॊकोलेट और भिंडी?
    क्या कॊम्बीनेशन है!

    ReplyDelete
  19. सुंदर और मजेदार आनंदित हो गया ह्रदय .. मेरे चिठ्ठे पर पधारने के लिए धन्यवाद पुन: आमंत्रण है सरकारी दोहे पढ़ने के लिए कृपया पधारें

    ReplyDelete

एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !