Tuesday, March 9, 2010

हम महिला विषयों पर न लिखें ? - सतीश सक्सेना



डॉ अरविन्द मिश्रा का एक चुभता हुआ कमेंट्स मेरा ध्यान उनकी ओर खींच ले गया है  " चलिए आप उदासीन और तटस्थ रहकर इसी तरह बीच बीच में आकर अपनी घोर चिंता व्यक्त करते रहा करिए -ब्लागजगत का जो होना है वह तो हो ही जाएगा "   


और मुझे लगा कि जैसे अरविन्द मिश्रा ने मुझसे कोई बहुत गहरी और सच्ची शिकायत की हो कि आप सोते हुए ही जागते रहो का नारा लगाते रहो ! और मैं तिलमिलाते हुए नींद से उठ गया !


अभी हाल में मिथिलेश दुबे  ने एक लेख लिख कर लगता है गज़ब ही कर दिया ! मैं कभी समझ नहीं पाऊंगा कि नारी विषय पर लिखने का अधिकार केवल कुछ महिलाओं का ही होना चाहिए ? किसी अन्य के लिखने पर जैसा यहाँ विरोध होता है, उससे तो ऐसा ही लगता है ! 


अजीब  हास्यास्पद कल्पना है कि नारी पर पुरुष लिखे तो पित्रवादी सत्ता लिखवा रही है ,मिथिलेश जैसा १९ वर्षीय विलक्षण लेख़क लिखे तो भी बवाल  ! मिथिलेश को कोई हक़ नहीं कि वह अपने पारिवारिक संस्कारों   के हिसाब से अपनी बहिन को कोई हिदायत दे सके अथवा अपनी माँ को कोई समर्थन दे ! 


मेरी जिन महिलाओं से बात हुई  वे खुद इस बात को मानती हैं कि कुछ लोग अपना नाम कमाने के लिए दूसरों को फ़ोन करके प्रति कमेंट्स करने के लिए उकसाते हैं , और अधिकतर महिलाएं यह न चाहते हुए  भी  विरोध नहीं कर पातीं ! 


महिलाओं पर न लिखने का अर्थ, स्नेह पर ना लिखना , प्यार पर न लिखना , जीवन पर न लिखना , ममता पर न लिखना ही है ! हमारे जीवन में बचेगा ही क्या अगर महिला वहाँ से हटा ली जाये ! मेरा महिला लेखकों से अनुरोध है कि वे खुले मन से विचार करें !   


क्या शिकवा है क्या हुआ तुम्हे 
क्यों आँख पे पट्टी बाँध रखी,
क्यों नफरत लेकर, तुम दिल में 
रिश्ते, परिभाषित करती हो,
हम पुरूष ह्रदय, सम्मान सहित, कुछ याद दिलाने बैठे हैं!

36 comments:

Mithilesh dubey said...

सतीश भईया सच कहूँ तो आपने मेरी बात लिख दी ।

Sonal Rastogi said...

आप की बात से सहमत हूँ महिलाओं पर न लिखने का अर्थ, स्नेह पर ना लिखना है
पर यह लेखन उपदेशात्मक नहीं होना चाहिए, और ना ही रुढियों को बढ़ावा देता हुआ, और यह एक संवेदनशील विषय है....परिपक्वता अपेक्षित है लिखते समय यह ध्यान रखना चाहिए "जब आप एक ऊँगली किसी पर उठाते है तो बाकि की तीन आपकी तरफ इशारा कर रही होती है"

Mithilesh dubey said...

@सोनल जी

तब तो आपके अनुसार जितने भी सघटन चल रहे है महिला विकास या उत्थान के लिए उन्हे बन्द कर दिया जाना चाहिए ,और जितने भी ब्लोग है इस तरह के जहाँ नारी को नवचेतना दी जारी है तथा उन्हे अपने अधिकारो के प्रती सजग किया जा रहा उन्हे भी बन्द किया जाना चाहिए , क्योंकि ये सब नारी विकास के लिए तत्पर हैं और उन्हे अच्छे बुरे का पाठ पढ़ाया जा रहा है और उपदेशात्मक भी हैं , क्यों इसको लेकर क्या ख्याल है आपका ???

Mired Mirage said...

'कुछ याद दिलाने बैठे हैं!'
कुछ अक्ल सिखाने बैठे हैं
कुछ पाठ पढ़ाने बैठे हैं।
तुम न होगी तो सोचो
कितने निराश हम हो जाएँगे
किसको हम यह, वह, सब सिखलाएँगे?
अब तो आजा मूढ़मति
अन्यथा गुरू कैसे कहलाएँगे?
लिखिए, किन्तु सीख की मात्रा कुछ कम कर दीजिए। इतनी सारी एक बार में कुछ अधिक ही हो जाती है।
वैसे मुझे अभी तक किसी ने फोन करके टिपियाने को नहीं कहा है। और यह किसी कौन है? शायद उसके पास मेरा फोन नम्बर नहीं है।
'सम्मान सहित',
घुघूती बासूती
ब्लॉग का url ही lightmood है सो कह दिया।
घुघूती बासूती

दिगम्बर नासवा said...

लिखने, कहने और अपना मत रखने की स्वतंत्रता सबको होनी चाहिए ... स्त्री पुरुष एक दूजे के पूरक हैं ... किसी का किसी पर अधिकार नही होना चाहिए ,.... लिखने पर तो बिलकल ही नही ...

Arvind Mishra said...

सतीश जी पहले तो आपकी विनम्रता ने मुझे बिना मोल खरीद ही लिया -मैंने वह टिप्पणी आपको आक्रोश में की थी इसलिए की हम तटस्थ होकर समस्याओं पर न लिखें और उपदेशात्मक न बनें -कईयों ने मेरी ऐसी टिप्पणियों को सकारात्मक नहीं लिया ,कुछ ने सम्बन्ध विच्छेद तक कर लिया और कुछ जानी दुश्मन बने हुए हैं -आपने जो सकारात्मता और विनयशीलता दिखाई वह मुझे भी गहरी संवेदित कर गयी -
हाँ नारी विषयों पर पुरुषों को खुले मन अपने विचार अवश्य रखने चाहिए ! परमुखापेक्षिता से बचना बचना चाहिए -पुरुष अक्सर नारद मोह में पड़े रहते हैं हम और आप सभी मगर बात मुद्दे की हो तो मोह को त्यागना ही चाहिए ! मिथिलेश टीनेजर युवा है -वह उम्र जबकि इस उम्र के बच्चों की चद्धियाँ माएं साफ करती हैं और वे 'दुलार के पिलई' बने माताओं के आंचल से चिपके रहते हैं -वह एक सामजिक सरोकार से जुड़ अपनी बात कह रहा है - निश्चय ही वह एक कुशाग्र बुद्धि किशोर है किसी के लिए भी उसकी अवलेहना भरी पड़ सकती है -नारी वस्त्र के चयन पर मैं उसके मत का कुछ सीमा तक समर्थन पहले भी कर चुका हूँ !

राज भाटिय़ा said...

अरे भाईया अगर हम नारी पर नही लिखे गे तो फ़िर किस पर लिखे गे, काली दास जेसे महा गाणी बन गये, अरे यह नारी पहले हमारे जीवन मै मां के रुप मै आती है, क्या मां पर लिखना पाप है??, फ़िर बहिन के रुप मे आती है? क्या एक बहिन के बारे लिखना पाप है, फ़िर एक प्रेमिका ओर बीबी के रुप मे आती है, तो क्या सारे शायर ओर कवि गलत थे, फ़िर बेटी ओर बेटे की बहुं के रुप मे आती है, क्या इन पर लिखा पाप है....
यह पाप शायद उन नारियो के लिये होगा जो इन सब रिशतो को पेसॊ से तोलती है, वो इन रिशतो की मिठास नही जानती, वो प्यार ओर पेसॊ का फ़र्क नही जानती.
आप ने बहुत सुंदर लिखा, हम अगर नारी पर नही लिखे गे तो यह दुनिया मै किस पर लिखेगे???

बी एस पाबला said...

@ Sonal Rastogi

आपकी बात सही है कि
परिपक्वता अपेक्षित है

किन्तु मैंने महसूस किया है कि
परिपक्वता का उमर से कोई सीधा संबंध नहीं और ना ही प्रजाति से!

रही बात उपदेशों की
तो
लगभग सभी धर्म, धर्मगुरू, शुभेक्छु, चिंतक उपदेश ही देते हैं, फिर चाहे वह मानव-धर्म हो या आध्यात्मिक

सारा दारोमदार तो बस ग्रहण करने वाले पर निर्भर करता है

ताऊ रामपुरिया said...

भाई हमको तो राज भाटिया जी ने इतने लठ्ठ खिलवाये हैं कि हम तो ये नाम तक भूल गये हैं. सपने मे भी हमतो प्रणाम करते हैं.

रामराम.

Udan Tashtari said...

सब को सभी के विषय में अपने विचार प्रकट करने का अधिकार है.

आपसे पूर्णतः सहमत!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

ब्लाग जगत में सम्यक व्यवहार बहुत कम मात्रा में है। धीरे-धीरे ही बढ़ेगा वह।

Sonal Rastogi said...

@मिथिलेश जी
यह सत्य है आपकी लेखनी में ओज है ,भाषा भी समृद्ध है पर आपने लेखनी ऐसे विषय पर चलाई है जिसको समझने के लिए अभी आपको जीवन के कुछ और पड़ाव पार करने होंगे आपके चर्चित ब्लॉग चर्चा में मुझे आपके अपने अनुभव कम और "विश्वसनीय सूत्रों से ज्ञात " किस्म के विचार ज्यादा लगे. अपने शब्दों पर ज़रा गौर कीजिये
"सघटन चल रहे है महिला विकास या उत्थान के लिए उन्हे बन्द कर दिया जाना चाहिए ,और जितने भी ब्लोग है इस तरह के जहाँ नारी को नवचेतना दी जारी है तथा उन्हे अपने अधिकारो के प्रती सजग किया जा रहा उन्हे भी बन्द किया जाना चाहिए , क्योंकि ये सब नारी विकास के लिए तत्पर हैं"

इसके अनुसार नारी निम्न स्तर पर है इतनी पतित है चेतनाशून्य है और अपने अधिकारों से अनभिज्ञ है जब तक आप उसे ज्ञान नहीं देंगे तब तक उसका भला नहीं होने वाला
अगर आपकी लेखनी से कोई कुरीति ,कुप्रथा भ्रष्टाचार .घरेलु हिंसा जैसे विषय पर लेख निकलता तो शायद युवा वर्ग का सही प्रतिनिधित्व करता

बाकी नारी को तो नारायण भी नहीं समझ आपये आपतो फिर भी नर है

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

अपनी बात कहने की स्वतन्त्रता हर व्यक्ति को है...सहमति होना न होना एक अलग बात है।

सतीश सक्सेना said...

@ Mired Mirage ,

आपका और आपके विचारों का हार्दिक स्वागत है, आपके आने से इस हलके फुल्के ब्लाग का सम्मान बढ़ा है !

कुछ याद दिलाने से मेरा तात्पर्य आप लोगों की नाराजी को, विनम्रता पूर्वक आपके कार्यों को सम्मान देते हुए, दूर करने का प्रयत्न मात्र है ! नारी विषयों पर लिखे गए हाल के लेखन में, अपने ही परिवार ही में, पुरुषों पर अपनी बात ठीक तरह से कहे बिना, मात्र प्रहार करने से कुछ नहीं होने वाला ! हाँ इससे कुछ लोगों को आप जबरन "पुरुष" बनाने पर कामयाब जरूर हो जायेंगी, और आप उनके प्रति न्याय नहीं कर पाएंगी हाल ही में अरविन्द मिश्र इसके उदाहरण हैं जिनपर लगातार होते आक्रमण के कारण वे और मुखर होते चले गए और कुछ लोगों ने आग में घी डालने का कार्य भी किया ! मेरा आपसे अनुरोध है कि कम से कम स्पष्टी करण का मौका तो देना ही चाहिए और बहस की एक स्वस्थ परम्परा का जन्म देने का प्रयास करने का प्रयत्न करना चाहिए !

मुझे नहीं लगता कि अरविन्द मिश्र , मिथिलेश दुबे, शास्त्री अथवा रचना के लिखे एक वाक्य के आधार पर हमें उनके सही व्यक्तित्व का परिचय मिल पायेगा, हो सकता है उनके कठोर आवरण के पीछे एक बेहद नरम दिल हो जो आने वाले समय में समाज को बहुत कुछ दे पाए, मगर पहले उसे पढने का प्रयत्न तो करना ही चाहिए !

सादर

Dr. Smt. ajit gupta said...

बात नारी पर लिखने की नहीं है। जब हम सब मानते हैं कि यह समाज पुरुष और नारी से मिलकर बना है तब हम दोनों के बारे में ही लिखें। कई बार महिलाओं के लिए उपदेशात्‍मक लिखने पर महिलाओं को क्रोध आ जाता है। हम महिलाएं कभी पुरुष की मानसिकता को भी जानना चाहती हैं जो केवल महिला की ही बात करके आनन्‍द प्राप्‍त करता है। कैसा है वो आनन्‍द या उसकी मानसिक तृप्ति? जो नहीं मिलने पर हिंसा में बदल जाती है। महिला को मालूम है कि पुरुष की सबसे बड़ी कमजोरी महिलाएं ही हैं तो वे आज उनका दोहन करने पर उतारू हैं। कम वस्‍त्र पहनकर पुरुषों की मानसिकता पर हमला करने को मैं भी जायज नहीं मानती हूँ लेकिन उसके लिए पुरुष भी तो आगे नहीं आते। सारे ही फिल्‍म के डायरेक्‍टर आदि महिलाओं को निर्वसन करके ही पेश करते हैं। यहाँ तक ही आज तो पुरुषों को भी निर्वसन करने की होड़ लगी है। एक किसी फिल्‍म में जान इब्राहिम ने तो अपनी चडडी तक उतारने की शुरुआत की थी। जब पुरुषों का इन विषयों पर विरोध नहीं होता तब महिलाओं को गुस्‍सा आता है। मिथिलेशजी ने अच्‍छा लिखा था लेकिन वो एकतरफा था। हमें समाज के लिए लिखना च‍ाहिए ना कि महिला और पुरुष के लिए। मैं यह भी मानती हूँ कि आज पुरुष बहुत ही मानसिक कष्‍ट से गुजर रहा है, उसे अपने आपको यथास्थिति में रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। लेकिन यह महिला को समझ नहीं आ रहा है कि पुरुषों पर क्‍या बीत रही है। वो तो यही समझती है कि जब वे अधनंगे घूम सकते हैं तो मैं क्‍यों नहीं। इसलिए आप लोग लिखिए कि पुरुषों को क्‍या-क्‍या कष्‍ट होता है? तब देखिए महिलाएं समझने लगेगी।

सतीश सक्सेना said...

@ डॉ श्रीमती अजीत गुप्ता,
स्वागत है आपके विचारों का, समस्या है कि महिला विषयों पर लेखन लिखते समय , अक्सर इस सोच को ध्यान में रख कर नहीं लिखा जाता अतः आप लोगों से तीक्षण तात्कालिक प्रतिक्रिया मिलती है इससे तिलमिलाहट स्वाभाविक हो जाती है, मेरा अनुरोध है कि आप लोग अपना आक्रोश स्वस्थ भाषा में और शांत शब्दों के साथ रखें तो स्वत "बिलबिलाहट" और "तिलमिलाहट" नहीं होगी मगर बहुतों को इस "तिलमिलाहट और बिलबिलाहट" से आनंद मिलता है तब आक्रोश के नए खेमें बन जाते हैं और समाज को नयी दिशा, औरों को साथ लेने का आपका प्रयत्न, व्यर्थ होता प्रतीत होता है !
सादर

Mithilesh dubey said...

@सोनल जी
इसके अनुसार नारी निम्न स्तर पर है इतनी पतित है चेतनाशून्य है और अपने अधिकारों से अनभिज्ञ है जब तक आप उसे ज्ञान नहीं देंगे तब तक उसका भला नहीं होने वाला
अगर आपकी लेखनी से कोई कुरीति ,कुप्रथा भ्रष्टाचार .घरेलु हिंसा जैसे विषय पर लेख निकलता तो शायद युवा वर्ग का सही प्रतिनिधित्व करता

जब ऐसा ही है तब पता नहीं क्यों नारीवाद को लेकर आप लोग इतना हो हल्ला कर रही हैं । रही बात युवा का सही प्रतिनिधित्व का तो आपके विचारों पर जरुरु अमल करने की कोशिश करुंगा ।

सतीश सक्सेना said...

@मिथिलेश दुबे ,
जब भी जवाब देने का प्रयत्न करो तो अपनी भाषा संयत होनी चाहिए और उसे दोबारा पढ़कर ही प्रकाशित करें, अनजाने में कहे शब्द भी कभी कभी समाज में जग हंसाई करा देते हैं ! तुम्हारा भूल वश कहा गया एक भी गलत शब्द, कोई "महा ग्यानी" इसकी ऐसी व्याख्या कर सकता है कि तुम्हारा निश्छल स्वभाव बेहद दूषित नज़र आयेगा !
आशा है अपने भैया की बात ध्यान देंगे !!

निर्मला कपिला said...

अरे अरे मेरे बच्चो ये लदाई किस लिये। ये ब्लाग सब को अपनी बात कहने का हक दे रहा है तो झगडा किस बात का सब अपने विचार रखो जिसे जो पसंद आये वो माने दूसरा ना माने। बस इतनी सी बात है । वैसे भी आजकल जो औरत की आजादी के नाम पर नंगा नाच हो रहा है उससे महिलायें भी कम दुखी नहीं हैं जब हम दशा और दिशा भतक जाते हैं तो समझो फिर से गुलाम बनने की राह पर हैं ये शायद आज की आधुनिक पीढी समझ नही रही है। मै अजित गुपता जी की बात से सहमत हूँ। क्या पुरुश और क्या औरत दोनो ही बराबर के दोशी हैं आज की स्थिती के लिये । पुरुश अहं और नारी शोषण से जिस से उसने ये बदले की राह चुनी है वो ये नही जानती कि इसमे उसका अपना क्या बचेगा। आजादी और उच्छृंम्खलता मे फर्क है। बस नारी मुक्ति अन्दोलन बिना दशा और दिशा के माप संड तय किये केवल राज्निती और अपनी छवि को चमकाने के लिये चल रहे हैं बेशक इसके अच्छे परिणाम भी हैं मगर सब कुछ अच्छा है ये बिलकुल गलत है । वैसे ब्लाग वुड मे ये सब चलता ही रहेगा। बस आप दिल खोल कर लिखते रहें । हमे तो अच्छा लगता है। बहुत बहुत शुभकामनायें

रचना said...

Kind Attn Mr satish saxena
Please note that in your latest post you have mentioned my name in one of the comments . You are requested not to mention my name ANYWHERE in your posts or comemtns because you are trying to draw milage susing my name and you have not been kind enough to publish my comments . I respect your decision to not publish my comment but then you should not even mention my name
Regds
rachna

सतीश सक्सेना said...

@रचना जी
मेरी बुद्धि के अनुसार, विवाद बढाने वाले कमेंट्स नहीं छपना चाहिए , तदनुसार ही निर्णय लिया गया है ! आप विद्वान् हैं अतः सबकी मंशा भांपने में समर्थ हैं मगर आपकी सार्वभौमिकता के बावजूद यह आवश्यक नहीं की जो आप सोचती है वह सत्य ही हो ! आपका नाम स्नेह वश लिया गया था जो स्वभावानुसार आपकी समझ नहीं आएगा !
बहरहाल आपका आदेश स्वीकार है और भविष्य में आपके नाम का उपयोग किसी भी जगह नहीं होगा आशा है यही आप भी करेंगी !
हाँ धर्म बहिन बनी रहोगी ऐसी उम्मीद है !

रचना said...

if you are afraid of discussions then why write on issues that require discussions

सलीम ख़ान said...

mudda bahut sahi disha men ja raha hai

yaha click karen MITHILESH ki 1 aur bangee...

http://lucknowbloggersassociation.blogspot.com/2010/03/blog-post_10.html

aur yaha bhi

http://lucknowbloggersassociation.blogspot.com/2010/03/blog-post_3527.html

सतीश सक्सेना said...

@रचना ,
मैं जीवन में अपने मौत से कभी नहीं डरता बल्कि इसे साथ लेकर चलता हूँ रचना, आज के लिए बेहतर है कि आप अपने कमेंट्स को ही दुबारा पढ़ लें कि वे कैसे हैं, भाषा में शालीनता रहना ही चाहिए चाहे वह पुरुष हो या महिला ! अगर मैं झूठ बोल रहा हूँ तो वह छिपने वाला नहीं देर सवेर सबको पता चलेगा !

@ अनाम / अनामिका
मैं प्यार बांटने की कोशिश करता हूँ इसका अर्थ यह न लगाएं कि मैं कोई कायर महात्मा जैसा व्यक्ति हूँ , जिसे प्रतिकार करना न आता हो या तुम जैसे घटिया लोगों को सबक नहीं दे सकता ! अगर कोई बदला लेने की प्रवृत्ति लेकर पीछे पड़ गया तो बच्चे भी घर में गालियाँ देंगे कि ब्लागिंग करने की जरूरत क्या थी ! आशा है तेरे जैसे कायर, मुंह छिपाने वाले दुबारा यहाँ नज़र नहीं आयेंगे !
अपना नाम लिखकर आलोचना करने वाले को भी यहाँ सुना जायेगा और सम्मान दिया जायेगा !

सुलभ § सतरंगी said...

लाइट ले यार !

बात सही है...!

सतीश जी आपका प्रयास अच्छा है.

Arvind Mishra said...

@देख लिया सतीश जी आपने -
आपका एक और ईमानदार और सत्यनिष्ठ प्रयास पर रचना सिंह जी ने झाडू फेर दिया .
एक अकेले यही हैं जिन्होंने इतना विद्वेष और घृणा फैला रखी हैं -मुझे नारी विद्रोही घोषित करने
में इनकी घोर भूमिका है -हाँ हाँ अब मैं घोर नारी विरोधी हूँ -नारीवादी ब्लॉगर अपने इस उपलब्धि पर अट्ठहास कर सकते हैं ! मेरे तो दिन बहुत बीत चुके मगर ये मिथिलेश आदि नारी विरोधी बन बैठे तब क्या होगा ?
इतना विषाक्त माहौल ?

Arvind Mishra said...

डॉ श्रीमती अजित गुप्ता जी की बात से पूर्ण सहमति -उन्होंने एक स्वस्थ विवेचन किया है इस मुद्दे पर

रचना said...

maerae kament ki kis bhasha sae aaptii haen bataayae taaki pataa to chalae kyaa apptijanak likha thaa maenae jis ko aap ne modrate kiyaa { moderation aapka adhikaar haen aur mae uska sammaan kartee hun } lekin aaksep agar meri bhasha sae haen to kament publish karekae bataayae taaki maee jaan sakun aur baaki bhi daekh sakaey

bloging mae bina link diyae aur bina naam liaye kuchh bhi kehna bekaar haen aur aaj kal saakshya aur pramaan kaa zamaanaa haen so darna kyaa

Jack said...

मै आपकी बात से सहमत हुं साथ ही आशा करता हुं आपको मेरा ब्ळॉग भी पसंद आए जो http://bit.ly/9Ctt9K

Mithilesh dubey said...

सतीश भईया डरना क्या , टिप्पणी प्रकाशित करिए ।

सतीश सक्सेना said...

रचना जी !
समझाया उसे जा सकता है जो समझने का प्रयत्न करे, आपको मैं समझाना नहीं चाहता , कमेंट्स मोडरेट करने का प्रयत्न मैं आपको किसी का नाम उसकी बिना परमिशन के नहीं बता सकता , आपने उक्त पोस्ट का ध्यान नए विषय की तरफ मोड़ लिया है, अतः इस पोस्ट का उद्देश्य ही ख़त्म हो गया है !

सतीश सक्सेना said...

अम्मा जी !
आपसे अनुरोध है कि किसी तीसरे व्यक्ति के नाम को लेकर भला बुरा न कहें , इस ब्लाग का उपयोग एक दुसरे को अगर सम्मान न दे सकें तो भी मेरा प्रयत्न है कि किसी के अपमान में बढ़ावा न दिया जाये ! बेनामी या क्षद्म नाम को छापना मैं बुरा नहीं मानता बशर्ते किसी और का अपमान मेरे यहाँ न हो !
आशा है आप मेरी बात को बुरा नहीं मानेंगी !
सादर

अम्मा जी said...

बेटा सतीश, तेरी बात का मैं बुरा नही मानूंगी. एक मां कैसे बुरा मान सकती है? सभी मेरे बेटे बेटियां हैं. पर कुछ कपूत निकल गये तो क्या उनको डांटने का अधिकार भी अम्माजी के पास नही है?

हम पूछती हैं कि अगर और ज्यादा छूट दी गई तो ये और बिगड जायेंगे. तो मुझे तो कलेजा कडा करके इनको सजा देनि ही पडेगी.

और बेटा...एक बात गांठ बांध ले...सांप को भी आत्मरक्षार्थ फ़ुंफ़कारना जरुरी है.

आज अम्माजी की तबियत कुछ ठीक नही है.

शहरोज़ said...

लोकतंत्र का यही लुत्फ़ है और अर्थ भी .कि आप अपनी बात कहें..वैचारिक मतभेद संभव है.लेकिन कुछ लोगों की इस आदतों का क्या किया जाय कि सही मुद्दे को भी वो अपने ताबड़-तोड़ कमेन्ट में कहीं और उलझा कर ले जाना चाहते हैं.
क्यों न हमें ऐसे लोगों के कमेन्ट का जवाब ही न दिया जाय.इन से उनकी हौसला अफजाई ही होती है.

somyaa said...

sabse pehle satish ji dhanyawaad aapke comment ka... kyunki usse housla badha saath hi uski wajah se mein aapke blog per aa paayi.

Dusri baat - Aapke post ke vishay per - ... Aaj ki mahila kamzor nahi rahi , agyani nahi rahi , khas taur per wo mahilaaye jo aapke vichaar padhne ke layak ho.. haan gaao mein aaj bhi mahila vishayo per jaagrukta laane ki zarurat hai. Jo mahila padhi likhi ho aur phir galat kadam uthaaye .. use sambhalne ka ya chetawni dene ka kya fayda wo to apne hoshowas mein hi koi bhi kadam uthati hai aur ye uski khud ki zimmedaari hai. Saath hi mein bhi is baat se sehmat hoon ki Samaj ko lekar chalna chahiye na ki kewal uske ek paksh ko - mahila ya purush. Haan kabhi kabhi krodh aa jaata hai jab ya to purush mahila se sahanubhuti jataye , ya use bahut hi agyani samajh bhashan de... khair! Likhne ka haq to sabhi ko hai aur sabhi apni maansikta ke hisab se likhte hain to ismein koi naaraz hone wali baat nahi.

Aakhri baat - Aapke saare comments padhe , debate bhayankar pratit hua , aur jo vishay hi badal gaya uske liye khed hai... ye blog per aam baat hai ... per aapka achhi aur sanyat bhasha per zor dena bilkul sahi hai aur shayad yahi hamari democratic liberty ki paribhasha hai. :)
Aapka aura aapke blog se jhalakta hai jo ki bahut hi sunder hai.
Bahut kuch sikhne ko mila aapke vicharo se aasha hai aage bhi aapka maargdarsha milega.
- Somyaa

शरद कोकास said...

आपका लिखा एक एक शब्द काबिले गौर है । धन्यवाद ।