
"रंग लेके दीवाने आगये , होली के बहाने आ गये..."
या संजीव कुमार की ढोलक की थाप और अमिताभ का मस्त और सदाबहार गीत
"रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे ..."
मैंने आज तक एक भी मित्र ऐसा नहीं देखा जो अपनी पत्नी के साथ या पति के साथ होली खेलते देखा गया हो !
वंदना अवस्थी दुबे ने होली पर एक परिचर्चा का आयोजन किया "होली के रंग-किसके संग?"
यदि आपको चुनना हो तो किसे चुनेंगे? पत्नी, प्रेयसी, मित्र या अन्य कोई....
और आज जब वंदना जी यही जवाब ब्लाग जगत में पूंछा तो अधिकांश दिग्गजों ने जो शादी शुदा थे एक ही रहस्य उद्घाटन किया कि वे सिर्फ पत्नी के साथ ही होली खेलना पसंद करते हैं किसी को भी अपने केशव स्वरुप की याद नहीं आयी हर जगह का माहौल राम मय ही था !
पहली बार लगा हिन्दी ब्लॉग जगत में कितनी ईमानदारी है दिल चाहे कुछ भी कहे ...
"दिल कहे रुकजा रे रुकजा यहीं पर कहीं
जो बात इस जगह है , कहीं पर नहीं "
मगर अब इस उम्र में इस आवाज को सुने कौन ???
सो बीवी से यही कहेंगे ' तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे .....